एकही बार परखिये ना

एकही बार परखिये ना वा बारम्बार । बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार॥ अर्थ: किसी व्यक्ति को बस ठीक ठीक एक बार ही परख लो तो उसे बार बार...
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हीरा परखै जौहरी

हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध । कबीर परखै साध को ताका मता अगाध ॥ अर्थ: हीरे की परख जौहरी जानता है – शब्द के सार– असार को परखने वाल...
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देह धरे का दंड है

देह धरे का दंड है सब काहू को होय । ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥ अर्थ: देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध निश्चित है ...
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मन मैला तन ऊजला

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग । तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥ अर्थ: बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उसस...
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हाड जले लकड़ी

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार । कौतिकहारा भी  जले कासों करूं पुकार ॥ अर्थ: दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी ...
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कबीर सोई पीर है

कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर । जो पर पीर न जानई  सो काफिर बेपीर ॥ अर्थ: कबीर  कहते हैं कि सच्चा पीर – संत वही है जो दूसरे की पीड़ा ...
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पढ़े गुनै सीखै सुनै

पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल। कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥ अर्थ : बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा  पर फिर भी...
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जाति न पूछो साधू की

जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान । मोल करो तरवार को पडा रहन दो म्यान ॥ अर्थ: सच्चा साधु सब प्रकार के भेदभावों से ऊपर उठ जाता है. ...
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काची काया मन अथिर

काची काया मन अथिर थिर थिर  काम करंत । ज्यूं ज्यूं नर  निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त ॥ अर्थ: शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है...
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तरवर तास बिलम्बिए

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत । सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ॥ अर्थ: कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो, जो बारह...
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मन मरया ममता मुई

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ॥ अर्थ: मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई अहंकार सब नष्ट हो ...
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