कुछ चंद पंक्तियों से शुरू करूँगी इन मर्दो की कुर्बानी को।
कि समेट लिया करते है आँसूओ की रवानगी को।

यह सोच कर की मर्द है वो।
 दर्ज़नो भर के दर्दो को घुट लिया करते है।

यह सोच कर की मर्द है वो।
तमाम रिश्ता उनके जेब मे पड़े चीलर के मापिक होता है मगर सारे रिश्तों को बखूबी निभाते है।

 सोच कर की करोड़ो का गुरु करते है।
 क्योंकि मर्द है वो।

लाख सितम खुद में समाते है वो।
बस यह सोच कर की मर्द है वो।

कलेजे की दुकडे को विदा करने से लेकर,ममता की आँचल को खोने तक मे खुद में दफन कर लेते है सारे गमो को।
बस यह सोच कर की मर्द है वो।
***
आसान नही होता एक बेटा बन जाना।
आसान नही होता एक पिता बन जाना।

आसान नही होता किसी अजनबी के सफर में हम सफर बन जाना।
आसान नहीं होता किसी के उमीदो पर खरा उतरना।
***
आसान नही होता अपने पंखों को काट कर किसी की उड़ान बन जाना।
आसान नही होता खुद के हाथों से ज़हर के प्याले को हलक मे उतारना।

मगर वह कर लेते है।
सब कुछ चुप-चाप सह लेते है।
बस यह सोच कर की  मर्द है वो,और मर्दो को कभी दर्द नही होता।

       नोट   - आसान नही था मेरे लिए इन शब्दों को एक कविता के रूप में पिरोना/ लिख पाना,एक लड़की हो कर लड़को/पुरुषों को दर्दो को समझ पाना।
बस छोटी सी कोशिश है,मेरी।
पढ़िए और बताइए जरूर की क्या लिख सकी मैं उनके भावनाओ को।

Radha Mahi Singh

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