करवाचौथ . . .

चाँद सदा जिसका रहा, सात समंदर पार।
विरहन करवाचौथ का, मना रही त्योहार।।
देश सुरक्षा में रहा, जिस विरहन का चाँद।
त्योहारों पर है हुआ, उसका मुखड़ा माँद।।

कैसे  विरहन तोड़ती, अपना यह उपवास।
व्रत है करवाचौथ का, सभी करें उपहास।।
चित्र  देख प्रिय का सदा, होती रही उदास।
विरहन करवाचौथ का, तोड़ रही उपवास।।

सारे  व्रत  में एक  यह, उत्तम  है  उपवास।
सभी कष्ट का हे प्रभो, करना अब संत्रास।।
असमंजस में ही रहा, विरहन का उपवास।
सखियाँ  करवाचौथ में, उड़ा रही उपहास।।

हर उत्सव फीका रहा, जिसका साजन दूर।
रखकर  करवाचौथ व्रत, दुआ करे भरपूर।।
व्रत यह करवाचौथ का, बिना नीर उपवास।
सदा सुहागन हो त्रिया, यही हृदय में आस।।

जग  में  करवाचौथ  का, त्रिया  करें उपवास।
सकल मनोरथ पूर्ण हो, रख कर उर में आस।।
मिले  सजन से प्यार बस, इतनी सी उर आस।
सदा   सुहागन   वह   रहे, इसीलिए  उपवास।।

Pradeep Kumar Poddar

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