ऐसी भी क्या नाराज़गी,
कभी हमसे हमारा हाल तो पूछो,

पढ़े - जुल्म क्यों सहती हो तुम . . .
मैं कैसे जीता हूँ हर रोज़,
कभी ये सवाल तो पूछो,



मिलो कभी फुर्सत में तुम हमसे,
कि तुम्हे दिल की बात बतानी है,

पढ़े - तेरी यादो के बिस्तर . . .
जल कर,बुझ कर राख बन कर भी,
तुझ जैसे यार की मुझे याद आनी है,


Shubham Poddar

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